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सवाल:

क्या आप यह चाहते हैं कि सारी तहरीकें खत्म हो जाएँ और लोग सिर्फ़ इन्फ़िरादी दावत पर आ जाएँ?

जवाब:

नहीं, हम हरगिज़ यह नहीं चाहते कि तहरीकें खत्म हो जाएँ। उम्मत की तारीख़ में कई तहरीकों ने दीन की ख़िदमत, इस्लाह, तालीम, दावत और तहरीक-ए-बेदारी के मैदान में क़ाबिल-ए-क़द्र काम किया है। आज भी बहुत सी तहरीकें अपने-अपने दायरे में ख़ैर और भलाई का ज़रिया हैं !

हमारा इख़्तिलाफ़ तहरीकों के वजूद से नहीं, बल्कि इस सोच से है कि दावत और ख़िदमत-ए-दीन को सिर्फ़ तहरीकी दायरों तक महदूद कर दिया जाए !

तजुर्बा बताता है कि हर तहरीक, चाहे वह कितनी ही मुफीद क्यों न हो, अपने कुछ उसूल, तरजीहात और तंज़ीमी दायरों की पाबंद होती है। यही उसकी ताक़त भी होती है, लेकिन कभी-कभी यही उसकी हद भी बन जाती है। बहुत से ऐसे काम, रिश्ते और मौके होते हैं जिन तक इन्फ़िरादी सतह पर पहुँचना आसान होता है, जबकि तहरीकी हैसियत से पहुँचना मुश्किल हो जाता है !

इसके अलावा तहरीकों का बुनियादी मक़सद लोगों को दीन की तरफ़ लाना, उनकी तर्बियत करना और उन्हें उम्मत की ख़िदमत के लिए तैयार करना होता है !

कई तहरीकों के बानियों और अकाबिर की बातों में भी यह मफ़हूम मिलता है कि तहरीक मंज़िल नहीं, बल्कि एक ज़रिया है। मक़सद यह नहीं कि इंसान सारी उम्र सिर्फ़ तहरीक के दायरे में ही घूमता रहे, बल्कि यह कि वह इतना तैयार हो जाए कि जहाँ भी हो, दीन का काम कर सके और उम्मत के लिए फ़ायदेमंद साबित हो !

एक हक़ीक़त यह भी है कि वक्त गुज़रने के साथ अक्सर तहरीकें एक तरह के ठहराव (stagnation) का शिकार हो जाती हैं !

कभी-कभी अपने मन्हज, अपने अकाबिर या अपने तजुर्बे के बारे में ग़ैर-मुतवाज़िन लगाव (गुलू) भी पैदा हो जाता है और ऐसे माहौल में दूसरी तहरीकों और दावती कोशिशों के साथ तालमेल और तआवुन कमज़ोर पड़ सकता है !

जब तहरीकें उम्मत को जोड़ने के बजाय नादानिस्ता तौर पर आपसी दूरी, तअस्सुब या इंतिशार का सबब बनने लगें, तो ऐसे दौर में तहरीकी पहचान से ऊपर उठकर उम्मती हैसियत से काम करना ज़्यादा मुफीद हो जाता है !

एक और अहम पहलू यह है कि लंबे अरसे तक किसी एक तहरीकी पहचान के साथ जुड़े रहने के बाद इंसान पर एक ख़ास “लेबल” लग जाता है – फिर लोग उसकी बात को उसके दलाइल और अख़लास की बुनियाद पर कम, और उसकी तहरीकी पहचान की बुनियाद पर ज़्यादा सुनते हैं जिससे नतीजतन उसकी बात का दायरा और असर कभी-कभी उसी हल्के तक महदूद हो जाता है !

जबकि दाई की असल पहचान किसी तहरीक का नुमाइंदा होना नहीं, बल्कि उम्मत का फ़र्द और दीन का ख़ादिम होना है इसलिए हमारा मक़सद तहरीकों को खत्म करना नहीं, बल्कि यह याद दिलाना है कि:

तहरीकें ज़रिया हैं, मक़सद नहीं !

पहचानों से ऊपर उम्मत है, और तहरीकी वफ़ादारियों से ऊपर दीन की वफ़ादारी है !

हम तहरीकों के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि दावत को तहरीकी हुदूद से बड़ा और उम्मती फ़िक्र से जोड़कर देखने के हक़ में हैं !


सवाल:

आप अपने इल्म में इज़ाफ़े के लिए या तालीम के लिए किन किताबों का सहारा लेंगे?

जवाब:

इल्म हासिल करने के लिए किताबों की कोई कमी नहीं है ! हर दौर में बेहतरीन और फ़ायदेमंद तस्नीफ़ात लिखी गई हैं ! लेकिन हमारी कोशिश यह रहती है कि दीन की बुनियादी समझ हासिल करने के लिए उन किताबों से ज़्यादा इस्तिफ़ादा किया जाए जो उम्मत में सदियों से मक़बूल, मुस्तनद और व्यापक तौर पर स्वीकार की जाती रही हैं !

इसी वजह से हम आम तौर पर पिछले दो सौ सालों में लिखी गई उन किताबों को अपनी बुनियादी तालीम का मरकज़ नहीं बनाते जो अक्सर किसी ख़ास तहरीक, तंज़ीम या मकतब-ए-फ़िक्र की नुमाइंदगी करने लगी हैं !

इसका मतलब यह नहीं कि उनमें इल्मी फ़ायदा नहीं है, बल्कि यह कि हम शुरुआत में ऐसी किताबों को तरजीह देते हैं जिन पर उम्मत का इज्माली एतमाद ज़्यादा रहा है और जो फ़िर्कावाराना या तहरीकी पहचान से ऊपर मानी जाती हैं !

हमारी कोशिश यह है कि हम अपने इल्म की बुनियाद सीधे क़ुरआन, सुन्नत और क्लासिकल उलेमा की विरासत पर रखें !

मिसाल के तौर पर:

क़ुरआन की तफ़सीर के लिए Tafsir Ibn Kathir जैसी मुस्तनद तफ़ासीर

तज़्किया, अख़लाक़ और रूहानी इस्लाह के लिए Ihya Ulum al-Din जैसी किताबें

हदीस, फ़िक़्ह, सीरत और इस्लामी तारीख़ के बुनियादी मआख़िज़

और हर दौर के उन मुस्तनद उलेमा से इस्तिफ़ादा जो इन अस्ल मआख़िज़ की रोशनी में रहनुमाई करते हैं

हमारा मक़सद किसी ख़ास लेखक, तहरीक या मकतब की ऐनक से दीन को देखना नहीं, बल्कि दीन को उसके अस्ल मआख़िज़ और उम्मत की मुस्तनद इल्मी विरासत की रोशनी में समझना है

शख़्सियतों से पहले उसूल, और नई तहरीकी अदबियात से पहले क़ुरआन, सुन्नत और उम्मत की क्लासिकल इल्मी विरासत — यही हमारी तालीमी तरजीह है !

साथ ही, हम यह भी मानते हैं कि किताबें रहनुमाई का एक ज़रिया हैं; उनकी सही समझ और सही तात्बीक़ के लिए मुस्तनद उलेमा की सोहबत और रहनुमाई हमेशा ज़रूरी रहेगी !


सवाल:


जब दूसरी तहरीकें अपनी मेहनत की तरफ लोगों को बुलाती हैं, तो क्या हम अपनी इस मेहनत की तरफ लोगों को दावत न दें?

जवाब:

बिल्कुल, हम अपनी इस फ़िक्र और मेहनत का तआरुफ़ लोगों से करवा सकते हैं और उन्हें इसमें शामिल होने की दावत भी दे सकते हैं लेकिन इसमें हिकमत, मिज़ाज-शनासी और लोगों के हालात को समझना बेहद ज़रूरी है !

हर व्यक्ति की फ़िक्री और तंज़ीमी पृष्ठभूमि एक जैसी नहीं होती ! कुछ लोग पहले से किसी तहरीक या तंज़ीम में पूरी तरह मुतहर्रिक होते हैं, उससे गहरा ताल्लुक रखते हैं और उसकी फ़िक्र से मुतमइन होते हैं ! ऐसे लोगों के सामने इस तरह की बातें रखने में अक्सर कोई ख़ास फ़ायदा नहीं होता, बल्कि कभी-कभी ग़ैर-ज़रूरी बहस और दूरी भी पैदा हो सकती है !

इसके बरअक्स कुछ लोग ऐसे होते हैं जो दावत के मैदान में काम करना चाहते हैं, लेकिन मौजूदा ढाँचों, तंज़ीमी पेचीदगियों या कुछ तजुर्बात की वजह से बेचैनी महसूस करते हैं !

उनके कुछ सवालात और शिकवे वही होते हैं जो हमारी फ़िक्र का भी हिस्सा हैं ! ऐसे लोगों तक यह बात आसानी से पहुँच सकती है और वे इसकी अहमियत को जल्दी समझ सकते हैं !

इसलिए हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि:

पहले इंसान को समझा जाए !

उसके मिज़ाज, ज़रूरत और फ़िक्री पस-ए-मंज़र को जाना जाए !

फिर मौक़े और मसलहत के मुताबिक बात रखी जाए !

हर व्यक्ति हर बात का मुख़ातब नहीं होता, और हर फ़िक्र हर इंसान के लिए एक जैसी क़ाबिल-ए-क़ुबूल नहीं होती !

दावत का तक़ाज़ा यह है कि बात सही होने के साथ-साथ सही इंसान, सही अंदाज़ और सही वक़्त पर भी कही जाए !

इसी हिकमत के साथ इस फ़िक्र का तआरुफ़ करवाना ज़्यादा मुफ़ीद और असरअंगेज़ होगा !


सवाल:

अगर किसी तहरीक के पाबंद नहीं रहोगे, तो दीन के बारे में रहबरी कैसे हासिल होगी?

जवाब:

हमारा मक़सद संगठित दीनी हलकों, तहरीकों या तंज़ीमों से अलग होकर कोई नया रास्ता निकालना नहीं है, और न ही हमारा उद्देश्य उलेमा, मदरसों या दीनी इदारों से बेनियाज़ होना है !

हम यह नहीं कहते कि इंसान बिना रहनुमाई के दीन समझ सकता है बल्कि हमारा मानना है कि दीन की सही समझ और अमल के लिए मुस्तनद उलेमा की रहबरी बेहद ज़रूरी है !

अलबत्ता, हम किसी ख़ास तहरीक, तंज़ीम या जमाअत की सदस्यता को दीन सीखने और उस पर चलने की लाज़िमी शर्त नहीं मानते !

हर इलाके में ऐसे बहुत से उलेमा मौजूद हैं जो इन्फ़िरादी सतह पर लोगों को इल्मी, तर्बियती और इस्लाही फ़ायदा पहुँचा रहे हैं ! वे किसी बड़े तंज़ीमी ढाँचे का हिस्सा हों या न हों, उनकी असल पहचान उनका इल्म, तक़वा, अख़लाक़ और उम्मत की ख़िदमत है !

हम ऐसे मुस्तनद और भरोसेमंद उलेमा की सोहबत, उनसे राब्ता और उनसे इस्तिफ़ादा को बेहद अहम समझते हैं !

इसलिए हमारा तसव्वुर यह नहीं कि “उलेमा के बग़ैर दावत”, बल्कि यह है कि:

“तहरीकी पाबंदियों के बग़ैर, उलेमा की रहबरी के साथ दावत।”

हम चाहते हैं कि हर साथी अपने इलाके के भरोसेमंद और मुस्तनद उलेमा से जुड़ा रहे, उनसे मसाइल पूछे, उनसे इल्म हासिल करे, उनकी नसीहतों से फ़ायदा उठाए और अपनी इस्लाही व इल्मी तरक़्क़ी का सिलसिला जारी रखे !

उलेमा से ताल्लुक ज़रूरी है, पर किस खास तहरीक के आलिम से इस्तीफादा उठाने को हम लाज़िम नहीं मानते बल्कि किसी तहरीक के साथ जुड़े हुए आलिम से भी हम नफा उठाना नहीं चाहते !


सवाल:

आपकी दावती मेहनत की शक्ल क्या होगी?

जवाब:

असल में दावत की कोई एक तयशुदा और स्थायी शक्ल नहीं होती ! हालात, ज़रूरत, लोगों की मानसिकता और मौकों के हिसाब से उसकी शक्लें बदलती रहती हैं !

तबलीग की जो कुछ मशहूर शक्लें हैं, उनका मक़सद अपने आप में मंज़िल नहीं था, बल्कि इंसान के अंदर दावत की आदत, फ़िक्र और मश्क पैदा करना था, ताकि वह अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी दीन का पैग़ाम पहुँचाने वाला बन सके !

क्योंकि दावत सिर्फ़ मस्जिद, जलसे या किसी ख़ास प्रोग्राम तक सीमित नहीं है बल्कि दावत तो:

घर में भी है,

रिश्तेदारों के बीच भी है,

ऑफिस और कारोबार में भी है,

मार्केट और सफ़र में भी है,

शादी-ब्याह और सामाजिक मेल-जोल में भी है,

बल्कि जहाँ इंसान मौजूद हो, वहाँ दावत का मैदान मौजूद है !

हमारी समझ के मुताबिक बहुत से लोगों ने दावती मश्क के लिए बनाए गए कुछ ढाँचों को ही असल दावत समझ लिया !

नतीजा यह हुआ कि जहाँ उनका सबसे ज़्यादा वक़्त गुज़रता है—जैसे ऑफिस, कॉलेज, मार्केट, व्यापारिक हल्के और सामाजिक संबंध—वहाँ दावत का रंग कम दिखाई देता है, जबकि दावती मिज़ाज तो वहीं सबसे ज़्यादा ज़रूरी था !

हालाँकि इन तर्तीबों और मश्कों की बुनियादी मंशा यही थी कि इंसान हर माहौल में दाई बने, न कि दावत को कुछ ख़ास मौकों और गतिविधियों तक सीमित कर दे !

इसलिए हमारा फोकस किसी विशेष ढाँचे या फ़ॉर्मेट का पाबंद बनना नहीं है !

हमारी कोशिश यह है कि नबवी मिज़ाज और नबवी तरतीब के मुताबिक जहाँ हम मौजूद हों, वहाँ जो भी व्यक्ति मिले, उसकी समझ, ज़रूरत और सतह को सामने रखते हुए उसे अल्लाह और दीन की तरफ़ माइल करने की कोशिश करें !


सवाल:

अगर आप “तहरीक-फ्री” होने का दावा करते हैं, तो क्या आपका यह प्लेटफ़ॉर्म खुद एक नई तहरीक नहीं है?

जवाब: नहीं !

तहरीक की कुछ बुनियादी पहचानें होती हैं:

एक तयशुदा क़ियादत (अमीर या नेतृत्व)

एक मरकज़ी निज़ाम

एक जैसी तर्बियत और तरतीब

कुछ उसूली और बुनियादी किताबें

एक निश्चित मन्हज और कार्यपद्धति, जिसकी पैरवी सभी पर लाज़िम हो

जबकि हमारे यहाँ:

कोई अमीर या केंद्रीय नेतृत्व नहीं है

कोई मरकज़ी तंज़ीमी ढाँचा नहीं है

कोई अनिवार्य उसूली किताब नहीं है

दावत का कोई एक तयशुदा मॉडल या तरीका नहीं है

हमारी एकमात्र शर्त है: दावत।

जो भी अल्लाह के दीन का पैग़ाम लोगों तक पहुँचाने, उनसे संवाद करने, उनकी गलतफ़हमियाँ दूर करने और समाज में इस्लाम का सही परिचय देने के लिए गंभीर है, वह इस प्रयास का हिस्सा बन सकता है !

हम किसी नई तहरीक की तामीर नहीं कर रहे, बल्कि दावत को तहरीकी, तंज़ीमी और फ़िर्कावाराना सरहदों से ऊपर उठाकर एक साझा ज़िम्मेदारी के रूप में ज़िंदा करना चाहते हैं !